सोलह सोमवार व्रत कथा | 16 Somvar Vrat Katha PDF Free

4.5/5 - (4 votes)

16 Somvar Vrat Katha | Solah Somvar Vrat Katha |Somvar Vrat Katha

नमस्कार दोस्तों, आज हम इस पोस्ट में आपको सोलह सोमवार व्रत कथा (16 Somvar Vrat Katha) के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे। इसके साथ हम आपको 16 Somvar Vrat Katha PDF In Hindi का Direct link भी Button के रूप में प्रदान करेंगे। जिसे क्लिक करके आप सम्पूर्ण सोमवार व्रत कथा को हिंदी में डाउनलोड कर पाएंगे।

Somvar Vrat Katha PDF
Somvar Vrat Katha PDF

16 सोमवार व्रत को संकट दूर करने वाला व्रत भी कहा जाता है। सभी स्त्री-पुरुष किसी मनोकामना से सोलह सोमवार व्रत को रखते है। इस व्रत को करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है।

जिन लोगो की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती है, घर पर किसी व्यक्तो को कोई न कोई गंभीर बीमारी घेरे रहती हो। परिवार पर कोई न कोई संकट बना रहता हो तो उन लोगो को सोलह सोमवार का व्रत अवशय करना चाहिए।

16 सोमवार का व्रत करने से भगवन शिव प्रसन्न होते है। और वे आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करते है।

इसके साथ ही जिन कन्याओ का विवाह नहीं हो पा रहा है या विवहा में कोई बंधा आ जाती है, तो वे कन्याएँ भी 16 सोमवार का व्रत रख सकती है।

कुछ लड़कियाँ एक सुन्दर सुयोगय वर प्राप्त करने के लिए भी सोलह सोमवार का व्रत करती है, और भगवन शिव की अनुकम्पा से उन्हें अच्छे वर की प्राप्ति होती है।

Table of Contents show

About – 16 Somvar Vrat Katha PDF | Somvar Vrat Katha PDF

PDF Name 16 Somvar Vrat Katha PDF
No. of Pages11
Size1.40 MB
LanguageHindi
GenresReligious, Spiritual, Vrat Katha
CategoryReligion & Spirituality
Last Updated July 14, 2023
PDF SourcePDFGLARE.COM
PDF Download LinkAvailable
Country of OriginIndia

सोलह सोमवार सम्पूर्ण पौराणिक व्रत कथा

Solah Somvar Vrat Katha:- एक बार भगवान शिव जी पार्वती जी के साथ भ्रमण करते हुए मृत्यु लोगे अमरावती नगरी में पहुंचे। उस नगर के राजा ने भगवान शिव का एक विशाल मंदिर बनवाया था। शिव जी और माता पार्वती उस मंदिर में रहने लग गए।

एक दिन माता पार्वती भगवान शिव से बोली, चलिए आज चौसर खेलते है आज मेरा चौसर खेलने का का मन हो रहा है। पार्वती की बात सुनकर शिव जी माता पार्वती के साथ चौसर खेलने को तैयार हो गए।

खेल शरू हुआ। खेल शरू होते ही उस मंदिर का पुजारी पूजा करने के लिए मंदिर में आ गया। माता पार्वती जी ने पुजारी से पूछा, पुजारी जी आप यह बताइए कि इस खेल में कौन जीतेगा? वह पुजारी भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था, तो उस पुजारी ने कहा कि मां भगवान शिव जी की ही जीत होगी।

परंतु चौसर में शिव जी की पराजय हुई और माता पार्वती जी जीत गई। तब माता पार्वती जी ने उस पुजारी को झूठ बोलने के अपराध में कोड़ी होने का श्राप दे दिया। और फिर भगवान शिव जी माता पार्वती के साथ कैलाश पर्वत वापस चले गए। 

पार्वती जी के श्राप की वजह से पुजारी जी को कोड़ की बीमारी लग गयी और वह कोड़ी हो गया। अब नगर के स्त्री-पुरुष उस पुजारी से दूर भागने लगे।

कुछ लोगों ने राजा से पुजारी के कोड़ी हो जाने की शिकायत की, तो राजा ने इस बात पर विचार कर उस पुजारी को मंदिर से हटा दिया। और उसके स्थान पर एक दूसरे ब्राह्मण को पुजारी बना दिया। अब वह कोड़ी पुजारी उस मंदिर के बाहर बैठकर भीख मांगकर अपना गुजरा करने लगा।

कुछ दिनों के उपरांत स्वर्ग से कुछ अप्सराएं उस मंदिर में आयी और उन्होंने पुजारी से पूछा की वह कोड़ी कैसे बन गए। तो पुजारी ने उन्हें भगवान शिव और पार्वती जी के चौसर खेलने और माता पार्वती द्वारा उसे श्राप देने की सारी बात बताई। तब अप्सराओं ने पुजारी से 16 सोमवार का विधिवत व्रत रखने को कहा।

पुजारी द्वारा पूजन विधि पूछने पर अप्सराओं ने कहा सोमवार के दिन सूर्य उदय से पहले उठकर, स्नान करने के बाद साफ वस्त्र पहनकर, आधा सेर गेहूँ का आटा लेकर उसके तीन अंग बनाना, फिर घी का दीपक जलाकर गुड़ नैवेद्य, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, फ़ूल, जनेऊ का जोड़ा लेकर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा अर्चना करना।

पूजा के बाद तीन अंगों में से एक अंग भगवान शिव को अर्पण करके, एक आप ग्रहण करें। शेष दों अंगो को भगवान का प्रसाद मानकर वह उपस्थित लोगो में बांट देना।

इस प्रकार व्रत करते हुए जब सोलह सोमवार हो जाए तो सत्रहवें सोमवार को एक पाव आटे की बाटी बनाकर, उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाना। फिर भगवान शिव को भोग लगाकर वहाँ उपस्थित स्त्री पुरुष और बच्चों को प्रसाद बांट देना।

इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने और व्रत कथा सुनने से भगवान शिव तुम्हारे कोड़ को नष्ट करके तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देंगे। इतना कहकर अप्सराएं स्वर्ग को चली गई। 

पुजारी ने अप्सराओं के कहे अनुसार सोलह सोमवार का विधिवत व्रत किया। पुजारी के पूजन व्रत करने से भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए और भगवान शिव की कृपा से पुजारी का कोड़ ठीक हो गया।

राजा ने उसे फिर से मंदिर का पुजारी बना दिया। वह मंदिर में भगवान शिव की पूजा कर आनंद से जीवन व्यतीत करने लगा।

कुछ दिनों बाद पृथ्वी का भ्रमण करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती उस मंदिर में पधारे। स्वस्थ पुजारी को देखकर पार्वती जी ने आश्चर्य से उसके रोग मुक्त होने का कारण पूछा, तो पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत करने की सारी कथा सुनाई।

पार्वती जी भी सोलह सोमवार व्रत की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने पुजारी से इसकी विधि पूछकर स्वयं सोलह सोमवार का व्रत प्रारंभ किया।

माता पार्वती उन दिनों अपने पुत्र कार्तिकेय के नाराज़ होकर दूर चले जाने से बहुत चिंतित रहती थी। माता पार्वती कार्तिकेय को वापस बुलाने के लिए बहुत सारे उपाय कर चुकी थी। लेकिन उनके सभी उपाय विफल रहे, और कार्तिकेय लौटकर उनके पास वापस नहीं आये।

सोलह सोमवार का व्रत करते हुए माता पार्वती जी ने भगवान शिव से कार्तिकेय के लोटने की मनोकामना की। व्रत समापन के तीसरे दिन सचमुच कार्तिके वापस लौट आए।

कार्तिकेय ने अपने हृदय-परिवर्तन के संबंध में पार्वती जी से पूछा, हे माता, आपने ऐसा कौन सा उपाय किया, जिससे मेरा क्रोध नष्ट हो गया और मैं वापस लौट आया? तब पार्वती जी ने कार्तिकेय को सोलह सोमवार के व्रत की कथा सुनाई।

कार्तिकेय अपने एक ब्राह्मण मित्र ब्रह्मदत्त के प्रदेश चले जाने से बहुत दुखी थे। उसको वापस लौटाने के लिए कार्तिकेय ने सोलह सोमवार का व्रत करते हुए ब्रह्मदत्त के वापस लौट आने की कामना प्रकट की। व्रत के समापन के कुछ दिनों के बाद कार्तिकेय का मित्र वापस आ गया।

ब्रह्मदत्त ने कार्तिकेय से पूछा कि हे मेरे मित्र, तुमने ऐसा क्या किया, जिससे प्रदेश में मेरे विचार एकदम बदल गए और मैं तुम्हे याद करता हुआ वापस लौट आया? 

कार्तिकेय ने अपने मित्र को भी सोलह सोमवार के व्रत की कथा सुनाई। ब्राह्मण मित्र व्रत के बारे में सुनकर बहुत खुश हुआ। और उसने भी व्रत किया।

सोलह सोमवार व्रत का समापन करने के बाद ब्रह्मदत्त विदेश यात्रा पर निकला। महानगर के राजा हर्षवर्धन की बेटी राजकुमारी गुंजन का स्वयंवर हो रहा था।

वहां की राजा ने प्रतिज्ञा की थी कि हथिनी यह माला जिसकी भी गले में डालेगी, वह अपनी पुत्री का विवाह उसी से कर देगा।

ब्राह्मण भी उत्सुकता वश महल में राजकुमारी का स्वयंवर देखने चला गया। वहां कई राज्यों के एक से बढ़कर एक राजकुमार स्वयंवर में भाग लेने आये थे। तभी वहाँ एक हथिनी सज धज कर अपनी सूँड में जयमाला लिए आयी और उस हथिनी ने ब्राह्मण के गले में जयमाला डाल दी। फलस्वरूप राजकुमारी का विवाह, ब्राह्मण से हो गया।

एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने पूछा कि हे प्राणनाथ आपने ऐसा कौनसा कार्य किया था जो उस हथिनी ने इतने राजकुमारों को छोड़कर आपके गले में जयमाला डाल दी। तो ब्राह्मण ने अपनी राजकुमारी पत्नी को सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया।

अब राजकुमारी ने अपने पति से सोलह सोमवार व्रत की महिमा को जानकर पुत्र प्राप्ति की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया। और सही समय आने पर भगवान शिव की कृपा से राजकुमारी के एक सुंदर, सुशील व स्वस्थ पुत्र हुआ।   

पुत्र का नाम गोपाल रखा गया। जब गोपाल बड़ा हुआ तो उसने अपने माता से प्रश्न किया कि हे माता, आपने ऐसा क्या उपाय किया कि मैंने आपके ही घर में जन्म लिया? तब गोपाल की माता गुंजन ने गोपाल को 16 सोमवार व्रत के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान की।

व्रत के बारे में ज्ञान प्राप्त होने पर गोपाल ने भी व्रत रखने की इच्छा की। गोपाल जब सोलह साल का हुआ तो उसने राजा बनने की इच्छा से 16 सोमवार के विधिवत वत किये।

16 सोमवार के व्रत सम्पन होने के बाद गोपाल पास के एक नगर में घूमने के लिए गया, तो वहाँ के वृद्ध राजा ने गोपाल को पसंद किया और अपनी पुत्री राजकुमारी मंगला का विवाह उससे बड़ी धूमधाम से करवा दिया।

सोलह सोमवार के व्रत करने से गोपाल महल में पहुंच कर आनंद से रहने लगा। दो वर्ष बाद वृद्ध राजा का निधन हो गया। वृद्ध राजा के निधन के बाद गोपाल को उस नगर का राजा बनाया गया। इस तरह 16 सोमवार के व्रत करने से गोपाल की राजा बनने की इच्छा पूरी हो गई।

राजा बनने के बाद भी गोपाल ने सोलह सोमवार का विधिवत व्रत करना नहीं छोड़ा। व्रत के समापन पर सतरवे सोमवार को गोपाल ने अपनी पत्नी मंगला से कहा कि व्रत की सारी सामग्री लेकर वह पास के शिव मंदिर में पहुंचे।

मंगला ने पति की आज्ञा का उल्लंघन करके, सेवको द्वारा, पूजा की सामग्री मंदिर में भेज दी। और वह शिव मंदिर में नहीं गई।

जब राजा ने भगवान शिव की पूजा पूरी की तो आकाशवाणी हुई कि हे राजन तेरी रानी ने सोलह सोमवार व्रत का अनादर किया है। इसलिए तू रानी को महल से निकाल दे, नहीं तो तेरा सब वैभव नष्ट हो जाएगा।

आकाशवाणी सुनकर उसने तुरंत महल में पहुंच कर अपने सैनिकों को आदेश दिया कि रानी को दूर किसी नगर में छोड़ा आओ।

सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन करते हुए उसे तत्काल घर से निकाल दिया। रानी भूखी-प्यासी उस नगर में भटकने लगी। रानी को उस नगर में एक बुढ़िया मिली।

वह बुढ़िया सूत कातकर बाज़ार में बेचने जा रही थी, लेकिन उस बुढ़िया से सूत उठ ही नहीं पा रहा था। बुढ़िया ने रानी से कहा, बेटी अगर तुम मेरा सूत उठाकर बाजार ले चलो और सूत बेचने में मेरी मदद करो तो मैं तुम्हें भी धन दूंगी।

रानी ने बुढ़िया की बात मान ली, लेकिन जैसे ही रानी ने सूत की गठरी को हाथ लगाया तभी ज़ोर की आंधी चली और गठरी खुल जाने से सारा सूत आंधी में उड़ गया। बुढ़िया ने उसे फटकार कर भगा दिया।

रानी चलते-चलते नगर में एक तेली के घर पहुंची। उस तेली को रानी की हालत पर दया आ गयी और तेली ने रानी को अपने घर में रुकने के लिए कह दिया, परन्तु उसी समय भगवान शिव के प्रकोप से उस तेली के जितने भी तेल से भरे मटके थे वे एक-एक करके फूटने लगे। इसपर तेली ने भी राजकुमारी को अपने घर से निकल दिया।  

तेली के घर से निकले जाने पर भूखी और प्यासी रानी वहाँ से आगे की ओर बढ़ चली। रस्ते में रानी को एक नदी दिखाई पड़ी। परन्तु जैसे ही रानी ने जल पीकर अपनी प्यास शांत करनी चाही तो रानी के स्पर्श से उस नदी का जल सूख गया। अब रानी बड़ी निराश होती हुई और वह अपनी किस्मत को कोसती हुई आगे चली गई।

रास्ते में रानी को जंगल से गुजरते हुए एक तालाब दिखाई दिया। उस तालाब का पानी एकदम स्वच्छ था। स्वच्छ जल को देखकर रानी को प्यास और ज्यादा बढ़ गई।

जल पीने के लिए रानी ने तालाब में उतरकर जैसे ही जल को पीना चाहा तो उस जल में अनगिनत कीड़े उत्पन्न हो गए। रानी ने दुखी होकर उसी दूषित जल को पीकर अपनी प्यास बुझाई।

जब रानी ने एक पेड़ के नीचे बैठकर विश्राम करना चाहा तो उसी समय उस पेड़ के सभी पत्ते सुखकर नीचे झाड़ गए। अब रानी दूसरे पेड़ के नीचे जाकर बैठी लेकिन जिस भी पेड़ के नीचे वह बैठती वही पेड़ सूख जाता।

वहाँ के ग्वालो ने जब उस जंगल और तालाब की यह हालत देखी तो उन्हें बहुत हैरानी हुई। और रानी की दशा देखकर ग्वाले रानी को पास के मंदिर में पुजारी के पास ले गए।

रानी के चेहरे को देखकर पुजारी जी समझ गए कि रानी अवश्य किसी बड़े घर से है, अपने भाग्य के कारण वह  दर-दर भटक रही है। पुजारी ने रानी पर तरस खाकर रानी से कहा, पुत्री तुम अब बिलकुल भी चिंता मत करो। अब आज से तुम मेरे साथ इसी मंदिर में रहो। धीरे धीरे कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा।

पुजारी की बाते सुनकर रानी को कुछ दिलासा मिला और रानी उस मंदिर में रहने लग गई। रानी जब भी भोजन बनाती तो उसकी सब्ज़ी जल जाती, आटे में कीड़े पड़ जाते, जल से दूषित हो जाता।

पुजारी जी भी रानी के दुर्भाग्य से दुखी और चिंतित होते हुए बोले, हे पुत्री, अवश्य ही तुमसे कुछ गलत काम हो गया है, जिसकी वजह से देवता तुमसे नाराज़ हो गए हैं और उनके नाराज होने की वजह से ही आज तुम्हारी यह हालत हुई है। तब रानी ने पुजारी को अपने पति का कहना न मानकर मंदिर न जाने और भगवन शिव की पूजा न करने की सारी बात बताई।

रानी की बात सुनकर पुजारी जी बोले, बेटी अब तुम चिंता मत करो। कल सोमवार है और कल से ही तुम 16 सोमवार के व्रत रखना प्रारम्भ कर दो। तुम्हारे 16  सोमवार के व्रत से प्रसन्न होकर भगवन शिव तुम्हारी गलतियों को अवशय क्षमा कर देंगे।

पुजारी जी की आज्ञा का पालन करते हुए रानी ने सोलह सोमवार के व्रत रखना शरू कर दिए। रानी ने सोमवार का व्रत रखते हुए भगवन शिव की बड़े ही मन से पूजा-अर्चना की और व्रत कथा भी सुनी। सत्रहवें सोमवार को रानी ने विधिवत 16 सोमवार के व्रत का समापन किया।

रानी के सोलह सोमवार का व्रत विधिवत पूर्ण होने पर राजा को अपनी पत्नी रानी की बहुत याद आयी, और राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को रानी को ढूंढ कर लाने के लिए भेजा। रानी को ढूंढते हुए सैनिक मंदिर में पहुंचे और रानी से लौटकर चलने के लिए कहा।

पुजारी ने सैनिकों से मना कर दिया और सैनिक निराश होकर लौट गए। उन्होंने महल वापस लौट कर राजा को सारी बात बताई।

सैनिको की बात सुन राजा स्वंय उस मंदिर की ओर चल दिए और मंदिर पहुंचकर सबसे पहले राजा ने उस पुजारी से माँफी मांगी, और कहा कि मैंने रानी को महल से निकला इसके लिए आप मुझे क्षमा कीजिये, और कृपा करके रानी को मेरे साथ भेज दीजिये।

पुजारी ने कहा, हे राजन, यह जो भी कुछ हुआ सब भगवान शिव के प्रकोप के कारण हुआ। आप रानी को अपने साथ ले जा सकते है। इतना कहकर पुजारी ने रानी को राजा के साथ भेज दिया।

रानी के महल पहुंचने पर महल में बहुत खुशियां मनाई गई। सरे नगर को सजाया गया। राजा ने रानी के मिल जाने के कारन सभी ब्राह्मणों को धन, अन्न, वस्त्र आदि का दान दिया। नगर में निर्धनों को वस्त्र बांटे गए।

अब रानी सोलह सोमवार का व्रत करते हुए महल में आनंदपूर्वक रहने लगी। भगवान शिव की अनुपम से उसके जीवन में सुखी ही सुख भर गए। 

सोलह सोमवार के व्रत करने और कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है, और जीवन में कभी किसी भी तरह की कमी नहीं होती है। साथ ही स्त्री-पुरुष, आनंदपूर्वक जीवन-यापन करते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं। 

Solah Somvar Vrat Katha In Hindi PDF Free Download

Somvar Vrat Katha‘ की PDF को डाउनलोड करने के लिए डायरेक्ट डाउनलोड बटन नीचे दिया गया है। जिसे क्लिक करके आप इस PDF को पढ़ सकते है और साथ ही यदि आप चाहे तो 16 Somvar Vrat Katha PDF को डाउनलोड भी कर सकते है।

16 Somvar Vrat Katha PDF Download >>

16 सोमवार व्रत की तैयारी कैसे करे

सोलह सोमवार व्रत की तैयारी में निम्नलिखित चरणों का पालन करें:

  • व्रत की शुरुआत में एक पंडित से परामर्श करें और व्रत करने के लिए उपयुक्त मुहूर्त और विधि का पालन करें।
  • व्रत करने से पहले अपने मन को शुद्ध करें और शिव जी की आराधना के लिए समर्पित करें।
  • व्रत के लिए आवश्यक सामग्री जैसे फल, फूल, नवरत्न, कपड़े, और पूजा सामग्री को एकत्र करें।
  • व्रत के लिए आवश्यक पूजा सामग्री जैसे शिवलिंग, गंगाजल, चंदन, कपूर, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, बिल्व पत्र, मोली, और फल को तैयार करें।

व्रत की तैयारी को पूरा करने के बाद, आप तैयार हो जाएंगे व्रत की पूजा विधि को पालन करने के लिए।

सोलह सोमवार व्रत की पूजा की आवश्यक सामग्री

  • शिवलिंग 
  • गंगाजल
  • चंदन
  • कपूर
  • अक्षत
  • धूप
  • दीप
  • नैवेद्य (फल और प्रसाद)
  • बिल्व पत्र
  • मोली
  • फल (अनार, नारियल, बनाना, सेब)

सोलह सोमवार व्रत की पूजा विधि – 16 Somvar Vrat Vidhi In Hindi

16 somvar vrat vidhi :- 16 सोमवार का व्रत विधवत रूप से ही किया जाना चाहिए, तभी इसका सर्वोत्तम लाभ मिलता है। इसलिए Somvar Vrat की विधि को जानना अत्यधिक आवश्यक है। नीचे 16 Somvar Vrat Vidhi को बताया जा रहा है। जिसे पढ़कर आप सोलह सोमवार व्रत की विधि को जान पाएंगे।

  • सबसे पहले शुद्ध और स्वच्छ ध्यान कक्ष में जाकर शिवलिंग को गंगाजल से स्नान कराएं। 
  • इसके बाद, शिवलिंग को सुंदरता से सजाएं, चंदन और कपूर लगाएं।
  • अब शिवलिंग पर अक्षत रखें और अपनी भक्ति और मन की अभिव्यक्ति के लिए मंत्रों का जाप करें।
  • इसके बाद, धूप और दीप जलाएं और शिवलिंग के सामने फल का नैवेद्य रखें।
  • बिल्व पत्र को शिवलिंग के ऊपर रखें और मोली को शिवलिंग की माला के रूप में बांधें।
  • पूजा के बाद, अपनी इच्छा की मांग करें और भगवान शिव की कृपा की प्रार्थना करें।

16 सोमवार व्रत विधि नियम – 16 Somvar Vrat Vidhi 2023

16 Somvar Vrat Vidhi के सम्पूर्ण नियम यहाँ नीचे दिए गए है –

  • पहले सोमवार से व्रत शुरू करें। इसे 16 सोमवारों तक लगातार रखना होगा।
  • व्रत के दिन सोमवार को उठकर स्नान करें। इससे शुभता बढ़ेगी।
  • भगवान शिव की पूजा के लिए एक शिवलिंग या मूर्ति को सजाएं। धूप, दीप, फूल और अर्चना के साथ पूजा करें।
  • शिव चालीसा, स्तोत्र या मंत्रों का जाप करें। इससे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
  • व्रत के दौरान शिव जी की कथा सुनें और उनके गुणों का गान करें।
  • शिवलिंग पर जल, दूध, बिल्वपत्र, धातू, पुष्प, चंदन, रूपे, जाफ़रान आदि समर्पित करें।
  • शिवाजी के भजन और कीर्तन का समय निकालें। इससे आत्मीयता बढ़ेगी।
  • शिवलिंग पर पानी चढ़ाएं और अपनी ईच्छा मांगें।
  • व्रत के दौरान मन, वचन और कार्य में सत्यता बनाएं रखें। अहिंसा और दया का पालन करें।
  • शिव जी का ध्यान करते समय मन को शांत रखें और मन्त्र का जाप करें।
  • व्रत के दौरान सत्यनारायण भगवान की कथा पढ़ें और उनकी आरती करें।
  • सोमवार के दिन सात्विक आहार लें और अवश्यंभावी बातों से बचें।
  • व्रतार्थी को भगवान शिव की आरती करने और उनकी आशीर्वाद प्राप्ति के बाद व्रत खत्म कर सकते हैं।
  • अंतिम सोमवार पर विधि और नियमों के अनुसार व्रत समाप्त करें।
  • व्रत समाप्त करने के बाद दिन भर भगवान की आराधना, सेवा और दान करें।

इस व्रत के द्वारा भगवान शिव की कृपा की कामना करें और उनके आशीर्वाद से सुखी, समृद्ध, और सफल जीवन प्राप्त करें।

भगवान शिव की आरती 

ओम जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी। त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

लक्ष्मी, सावित्री पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ 

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥ 

ओम जय शिव ओंकारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

16 सोमवार व्रत संपूर्ण जानकारी, पूजा नियम, मंत्र प्रसाद, व उद्यापन विधि

सोलह सोमवार व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें

सोलह सोमवार व्रत के दौरान निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

ये करें:

  • व्रतार्थी को पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ व्रत पालन करना चाहिए।
  • शिव जी की आराधना करते समय शांत और ध्यान में रहें।
  • मंत्रों का जाप करने के बाद व्रतार्थी को अपनी मनोकामनाएं मांगनी चाहिए।
  • अपने मन और शरीर को शुद्ध रखने के लिए सत्य, तपस्या, और दान करें।

ये न करें:

  • व्रत के दौरान अनियमित और अनैतिक कार्यों का न करें।
  • ज्यादा खाने-पीने से बचें और सात्विक आहार पर ध्यान केंद्रित करें।
  • क्रोध, ईर्ष्या, और अन्य दुष्ट गुणों को अपने मन से दूर रखें।
  • बातचीत में अश्लील भाषा या अनुचित व्यवहार से बचें।

सोलह सोमवार व्रत के नियमों का पालन करके व्रत करने वाला व्यक्ति इस व्रत से अधिकाधिक लाभ उठा सकते हैं।

सोलह सोमवार व्रत के फायदे

सोलह सोमवार व्रत करने से व्रत करने वाले को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के साथ भगवान शिव के कृपालु होने का अनुभव होता है।
  2. शिव भक्ति में वृद्धि होती है और व्रतार्थी के जीवन में सुख और समृद्धि की वृद्धि होती है।
  3. व्रत करने से रोगों का निवारण होता है और शारीरिक स्वास्थ्य मजबूत होता है।
  4. सोलह सोमवार व्रत करने से धन, संतान, और शौर्य की प्राप्ति होती है।

यदि व्रत करने वाला व्यक्ति निष्ठापूर्वक और नियमित रूप से सोलह सोमवार व्रत का पालन करें, तो उन्हें इन लाभों का अनुभव करने का अवसर मिलता है।

सोलह सोमवार व्रत के लिए उपयोगी मंत्र

सोलह सोमवार व्रत के दौरान व्रतार्थी निम्नलिखित मंत्रों का जाप कर सकते हैं:

  1. ॐ नमः शिवाय: (Om Namah Shivaya)
  2. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
  3. ॐ नमः शिवायै शान्तायै सर्वरोगनिवारिण्यै। अद्या मंगलकारी देवी पार्वती प्रसीद मे॥

इन मंत्रों का नियमित जाप करने से व्रत करे वाले स्त्री या पुरुष को मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

FAQs – सोलह सोमवार व्रत कथा | Somvar Vrat Katha

प्रश्न 1: सोलह सोमवार व्रत कब से शरू करें?

उत्तर: सोलह सोमवार व्रत श्रवण मास के सोमवार से आरंभ किया जाता है।

प्रश्न 2: 16 सोमवार के व्रत में क्या खाना चाहिए?

उत्तर: 16 Somvar Vrat में आप फल, खोया की मिठाई, पेठे की मिठाई, दूध और मेवों का सेवन कर सकते है। सोलह सोमवार के व्रत में आलू, नमक, आटा, चावल, बेसन, सूजी और सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 3: व्रत के दौरान कितनी बार भोजन करना चाहिए?

उत्तर: सोलह सोमवार व्रत के दौरान व्रतार्थी को एक बार ही भोजन करना चाहिए। इसे संध्या काल में करना अधिक शुभ माना जाता है।

प्रश्न 4: लड़कियाँ सोमवार के व्रत क्यों रखती हैं?

उत्तर: लड़कियाँ सोमवार के व्रत रखती हैं क्योंकि इसके पीछे कई कारण होते हैं। पहले तो, यह व्रत भगवान शिव की पूजा और आराधना का एक विशेष उपाय माना जाता है। लड़कियाँ भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के इच्छुक होती हैं और उनके आशीर्वाद से सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्राप्ति करने की आशा करती हैं।

प्रश्न 5: क्या मासिक धर्म के दौरान सोमवार का व्रत रखा जा सकता है?

उत्तर: मासिक धर्म के दौरान सोमवार का व्रत रखा जा सकता है। हालांकि, यह व्यक्ति की अनुभवशीलता पर निर्भर करता है। कुछ लोग मासिक धर्म के दौरान व्रत नहीं रखते हैं, जबकि कुछ लोग अपने स्वास्थ्य की देखभाल के साथ व्रत करते हैं। इसलिए, यह व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और आपके परिवार की परंपरा के अनुसार निर्णय किया जाना चाहिए।

प्रश्न 6: सोमवार के व्रत का क्या फायदा है?

उत्तर: सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रतार्थी को कई तरह के लाभ प्रदान करता है। पहले तो, यह व्रत भगवान शिव की कृपा को प्राप्त करने का एक उपाय है और सुख, समृद्धि, और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति में सहायता करता है।

इसके अलावा, यह व्रत व्यक्ति को आत्म-निर्भरता और धैर्य की भावना प्रदान करता है। इसके साथ ही, सोमवार के व्रत का पालन व्यक्ति को धार्मिक सामरिकता और आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।

Conclusion

सोलह सोमवार का व्रत भगवान शिव की पूजा और आराधना का महत्वपूर्ण उपाय है। यह 16 सोमवार का व्रत, व्रत करने वाले व्यक्ति को मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है और भगवान शिव की कृपा को प्राप्त करने में सहायता करता है। इसलिए, आप भी सोलह सोमवार व्रत का पालन करें और भगवान शिव की आराधना करते हुए उनकी कृपा की प्राप्ति करें।

दोस्तों यह पोस्ट आपको कैसी लगी? कृपया करके हमे कमेंट बॉक्स में जरूर बताये। और इस पोस्ट को पूरा पढ़ने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

1 thought on “सोलह सोमवार व्रत कथा | 16 Somvar Vrat Katha PDF Free”

Leave a Comment